प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर दागी अधिकारी की तैनाती, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद भी कार्रवाई के बजाय मिला इनाम

बलरामपुर जिले की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं के घेरे में है। छत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा कथित तौर पर दागी छवि वाले अधिकारी मनिराम यादव को प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी नियुक्त किया गया है। स्थानीय शिकायतकर्ताओं और सूत्रों से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, इस अधिकारी का इतिहास पुराना और विवादों से भरा रहा है, इसके बावजूद शासन द्वारा उन्हें दंडित करने के स्थान पर पदोन्नति देकर जिला शिक्षा अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पद का पुरस्कार थमा दिया गया है। वर्तमान में बलरामपुर में पदस्थ होने के बाद से उन पर लगातार पद के दुरुपयोग, करोड़ों रुपये के गबन और व्यापक स्तर पर अवैध वसूली के आरोप लग रहे हैं, जिससे पूरे जिले के शैक्षणिक माहौल में भय और असंतोष का वातावरण निर्मित हो गया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्यपाल के अपर सचिव द्वारा भी दिनांक 17.03.2026 को छत्तीसगढ़ शासन स्कूल शिक्षा विभाग को एक आधिकारिक पत्र लिखा गया था। राजभवन से जारी इस पत्र में मनीराम यादव के विरुद्ध विभिन्न विभागीय जांचें संस्थित होने के बावजूद उन्हें नियम विरुद्ध पदोन्नति देने और प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी नियुक्त किए जाने के संबंध में संज्ञान लेते हुए पूरे मामले की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।
दस्तावेजों के अनुसार मनिराम यादव का विवादों से नाता बहुत पहले से ही है ।
वर्ष 2016 मे, जब वे विकासखंड लुंड्रा में प्रभारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी के पद पर थे। उस दौरान मध्यान्ह भोजन योजना के अंतर्गत किचन शेड निर्माण और डिवाइस मद की लगभग दो करोड़ बयालीस लाख रुपये से अधिक की राशि में हेराफेरी, गबन और सरकारी धन को निजी खातों में ट्रांसफर करने के गंभीर आरोप लगे थे। इस मामले की जांच के बाद सरगुजा संभाग के कमिश्नर द्वारा उन्हें निलंबित भी किया गया था और विभागीय जांच बैठाई गई थी, लेकिन ऊंचे रसूख के बल पर उस जांच को दबा दिया गया。 इसके बाद जब वे जशपुर जिले के बगीचा विकासखंड में पदस्थ हुए, तब वहां भी भ्रष्टाचार के नए मामले सामने आए। वहां एक शासकीय हाई स्कूल के भृत्य अर्जुन राम के पेंशन प्रकरण को जानबूझकर लटकाने और उसके एवज में मोटी रकम मांगने की लिखित शिकायत कलेक्टर से की गई थी। जांच समिति की रिपोर्ट में दोषी पाए जाने पर मई 2025 में कमिश्नर कार्यालय द्वारा उन्हें दोबारा निलंबित कर दिया गया था。
इतना ही नहीं, दिसंबर 2021 में सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें वे मध्यान्ह भोजन बनाने वाली रसोइयों और महिला समूहों से कथित तौर पर कमीशन की राशि लेते और उसका हिसाब-किताब एक रजिस्टर में दर्ज करते नजर आए थे। महिला समूहों ने तब आरोप लगाया था कि यह अवैध वसूली ऊपर बैठे नेताओं और अधिकारियों के नाम पर की जाती थी। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में बच्चों के पोषण से जुड़ी योजना में इस तरह की कमीशनखोरी ने शासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। इतने गंभीर आरोपों, प्राथमिक पुष्टियों और निरंतर चल रही विभागीय जांचों के बाद भी सेवा नियमों को दरकिनार करते हुए उन्हें व्याख्याता से प्राचार्य पद पर पदोन्नत कर दिया गया। सूत्रों का कहना है कि स्कूल शिक्षा विभाग के प्रभावशाली व्यक्तियों और राजनेताओं के विशेष संरक्षण के कारण उनकी गोपनीय चरित्रावली को उत्कृष्ट दिखाकर यह पदोन्नति और संवेदनशील पद की जिम्मेदारी सौंपी गई।
बलरामपुर में प्रभार संभालने के बाद उनके कार्यकालों में कथित भ्रष्टाचार की सूची और लंबी हो गई है। सत्र 2025-2026 की अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं के दौरान जिला स्तरीय केंद्रीकृत प्रणाली का हवाला देकर कक्षा पांचवीं, आठवीं और नौवीं से बारहवीं तक के छात्रों से मनमाना परीक्षा शुल्क वसूला गया, जिससे करीब 32 से 35 लाख रुपये एकत्रित किए गए। आरोप है कि इस राशि का उपयोग निजी प्रिंटर्स को अनुचित लाभ पहुंचाने में किया गया और बदले में घटिया स्तर के प्रश्नपत्र बांटे गए। जब कुछ प्राचार्यों ने इस पर आपत्ति जताई कि तत्कालीन कलेक्टर द्वारा ऐसी किसी केंद्रीकृत परीक्षा का निर्देश नहीं दिया गया था, तो मनिराम यादव ने अपने पद का रौब दिखाते हुए कहा कि शिक्षा विभाग के कलेक्टर वे स्वयं हैं और उनके काम करने का तरीका अलग है। इसके अलावा, उन्होंने अपने निजी चैंबर की साज-सज्जा और मरम्मत के लिए बिना किसी निविदा प्रक्रिया या सक्षम प्राधिकारी की वित्तीय स्वीकृति के विद्यालय निर्माण के ब्याज मद से लगभग ग्यारह लाख रुपये का आहरण कर लिया, जो कि छत्तीसगढ़ वित्तीय संहिता का खुला उल्लंघन है।
शिक्षकों के बीच भी अधिकारी की कार्यप्रणाली को लेकर भारी आक्रोश है। जिले में हुए शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण नीति को पूरी तरह निष्प्रभावी करते हुए दूरस्थ और एकल शिक्षकीय विद्यालयों में भेजे गए करीब 100 से 130 शिक्षकों को पांच से सात लाख रुपये के कथित आर्थिक लेन-देन के माध्यम से पुनः उनके सुविधाजनक या गृह क्षेत्रों में पदस्थ कर दिया गया, जिससे अनुमानतः सात करोड़ रुपये से अधिक की अवैध वसूली की आशंका जताई जा रही है। इसके साथ ही, प्रत्येक विकासखंड में कुछ स्थानीय पत्रकारों के साथ सांठगांठ कर शिक्षकों की छोटी कमियों को सोशल मीडिया पर वायरल कराया जाता है और फिर अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर दिखाकर वसूली की राशि आपस में बांटी जाती है। व्यक्तिगत लाभ के लिए शासकीय अमले के दुरुपयोग का एक और उदाहरण अंबिकापुर में देखने को मिल रहा है, जहां अधिकारी के लगभग पंद्रह करोड़ रुपये की लागत वाले निजी आलीशान भवन के निर्माण और निगरानी कार्य में कुसमी और शंकरगढ़ क्षेत्र के 18 से 20 शासकीय शिक्षकों को मौखिक आदेश पर लगाया गया है, जबकि स्कूलों में उनकी फर्जी उपस्थिति दर्ज की जा रही है।
भ्रष्टाचार का यह जाल अशासकीय विद्यालयों की मान्यता और उसके नवीनीकरण की फाइलों तक भी फैला हुआ है, जहां बिना भौतिक सत्यापन या निरीक्षण समितियों पर दबाव बनाकर प्रति प्रकरण पांच लाख रुपये तक की मांग की जाती है। सेवानिवृत्त शिक्षकों को सत्र के अंत तक पुनर्नियुक्ति देने के शासनादेश का उल्लंघन करते हुए आदेश जारी करने के नाम पर दस से पचास हजार रुपये वसूले जा रहे हैं और राशि न देने वालों का वेतन रोककर उन पर मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। वाड्रफनगर विकासखंड में व्यवसायिक सामग्री क्रय हेतु आवंटित प्रति विद्यालय दो लाख रुपये की राशि में से प्राचार्यों पर एक निश्चित फर्म से ही खरीदारी करने और पचास प्रतिशत राशि जिला शिक्षा अधिकारी को वापस लौटाने का दबाव बनाने की बात सामने आई है。 नियम विरुद्ध काम न करने वाले विद्यालयों पर ऑडिट के नाम पर दंडात्मक कार्रवाई की धमकियां दी जा रही हैं।
जिले के अस्थायी और कम वेतन पाने वाले अतिथि शिक्षकों को भी नहीं बख्शा गया है, उनसे सेवा विस्तार और कार्यकाल की जांच न कराने के नाम पर प्रति व्यक्ति बीस हजार रुपये की मांग की जा रही है, जिसके विरोध में प्रांतीय अतिथि शिक्षक संघ ने कलेक्टर के समक्ष लिखित शिकायत भी दर्ज कराई है।
शासन द्वारा गैर-शैक्षणिक कार्यों में शिक्षकों को न लगाने के स्पष्ट आदेशों के बावजूद, राजनीतिक रसूख के कारण एक संविदा हिंदी शिक्षिका को मूल पद से हटाकर जिला शिक्षा कार्यालय में खेल संबंधी कार्यों के लिए संलग्न रखा गया है, जो कार्यालय में उपस्थित भी नहीं होतीं। शासन स्तर पर जीरो टॉलरेंस और सुशासन के बड़े-बड़े दावों के विपरीत बलरामपुर की यह जमीनी हकीकत प्रशासनिक तंत्र की विफलता को दर्शाती है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि अधिकारी के सगे भाई के संगठन में सक्रिय होने और ऊंचे राजनेताओं तक सीधी पहुंच होने के कारण वे पूरी तरह बेखौफ हैं और अपनी मनमुताबिक कार्यशैली से भ्रष्टाचार के नए आयाम गढ़ रहे हैं। जिला शिक्षा अधिकारी के विरुद्ध लगे आरोपों और और आप साबित होने के बाद पूर्व में हुए निलंबन के बावजूद अब देखना यह है कि विभाग इस दागी अधिकारी को पद से पृथक कर निष्पक्ष वित्तीय व विभागीय जांच सुनिश्चित करता है या फिर राजनीतिक संरक्षण का यह खेल यूं ही जारी रहेगा।





