अंबिकापुर चांदमारी भूमि विवाद: प्रथम व्यवहार न्यायालय द्वारा अपर कलेक्टर को सिविल जेल भेजने के नोटिस पर जिला प्रशासन ने जारी किया स्पष्टीकरण, हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन

अम्बिकापुर । अंबिकापुर में लंबे समय से चले आ रहे श्रीगढ़ भूमि प्रकरण (चांदमारी भूमि विवाद) ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। सोशल मीडिया और प्रशासनिक हलकों में उस आदेश की चर्चा जोरों पर है, जिसमें प्रथम व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी (पीठासीन अधिकारी श्री पल्लव रघुवंशी) द्वारा अपर कलेक्टर को सिविल जेल भेजने और कलेक्टर के खिलाफ न्यायालय की अवमानना के संबंध में माननीय उच्च न्यायालय में कार्रवाई हेतु प्रस्ताव भेजने का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले में अब जिला प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर अपनी वस्तुस्थिति स्पष्ट की है
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क्या है 1962 का मूल भूमि विवाद?
जिला प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, माननीय जिला न्यायाधीश अम्बिकापुर के व्यवहार वाद क्रमांक 02 अ/1989 (नंदकिशोर प्रसाद विरुद्ध श्रीमती सहोदरी व अन्य) में 19 मार्च 1991 को एक आदेश पारित किया गया था। इस आदेश में ग्राम श्रीगढ़ स्थित खसरा नंबर 165, 186, 15/1 और 19/1 (कुल रकबा 3.66 एकड़) तथा मकान के विधिवत बंटवारे का निर्देश दिया गया था।
प्रशासन का कहना है कि यह पूरी ज़मीन 31 मार्च 1962 को तत्कालीन मध्यप्रदेश शासन द्वारा विधिवत पंजीबद्ध विक्रय पत्र (Registered Sale Deed) के माध्यम से तत्कालीन भूमि स्वामियों (भागवत साय और चतुर राम पिता तुलसी केशरवानी) से 1500 रुपए विक्रय मूल्य चुकाकर क्रय की गई थी। उस वक्त से लेकर आज तक इस ज़मीन का उपयोग चांदमारी (पुलिस फायरिंग प्रशिक्षण) प्रयोजन के लिए किया जा रहा है। प्रशासन का तर्क है कि आज दिनांक तक इस रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को किसी भी सक्षम न्यायालय द्वारा निरस्त नहीं किया गया है।
न्यायालय में शासन का पक्ष छिपाए जाने का आरोप
जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 1989 के उक्त व्यवहार वाद में तत्कालीन शासन/कलेक्टर को पक्षकार तो बनाया गया था, लेकिन शासन को इस वाद की कोई सूचना नहीं दी गई और न ही शासन का पक्ष सुना गया। वादी द्वारा न्यायालय के समक्ष यह महत्वपूर्ण तथ्य छिपाया गया कि संबंधित ज़मीन शासन द्वारा पहले ही रजिस्टर्ड दस्तावेज से खरीदी जा चुकी है। इसके अतिरिक्त, लगभग 21 वर्षों के लंबे विलंब से इस वाद के निष्पादन हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया था।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में विचाराधीन है मामला
इस एकपक्षीय स्थिति और शासकीय भूमि की सुरक्षा को देखते हुए, राज्य शासन की ओर से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर के समक्ष रिव्यू पीटिशन क्रमांक 107/2017 (मप्र शासन, वर्तमान छत्तीसगढ़ शासन, कलेक्टर सरगुजा विरुद्ध कन्हैया प्रसाद व अन्य) 5 सितंबर 2017 को प्रस्तुत की गई थी। यह प्रकरण वर्तमान में माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। प्रशासन का कहना है कि मामला अदालत में लंबित होने के कारण इस पर अंतिम निर्णय शासन या उच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही लिया जा सकता है।
अपर कलेक्टर को नोटिस और हालिया कार्रवाई
बावजूद इसके, पुराने आदेश का निष्पादन न होने पर प्रथम व्यवहार न्यायाधीश, अम्बिकापुर द्वारा 17 अप्रैल 2026 को अपर कलेक्टर सरगुजा को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए सिविल जेल भेजे जाने के संबंध में चेतावनी दी गई। इसी प्रकार, 23 जुलाई 2026 को कलेक्टर सरगुजा को भी नोटिस जारी कर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय को अवमानना की सूचना देने की बात कही गई।
इस बीच, प्रशासनिक स्तर पर विधिक प्रक्रिया का पालन करते हुए तत्कालीन कलेक्टर के निर्देश (03 जुलाई 2025) के तहत नायब तहसीलदार को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए। इसी क्रम में, 27 जुलाई 2026 को सक्षम राजस्व न्यायालय द्वारा व्यवहार न्यायालय के आदेश के अनुपालन में ग्राम श्रीगढ़ की शासकीय भूमि (खसरा क्रमांक 15/1 एवं 19/1 को छोड़कर) अन्य भूमि खसरा क्रमांक 165/1 एवं 186/1 (कुल रकबा 1.047 हेक्टेयर) को तीन समान भागों में बांटने का आदेश पारित कर दिया गया है।
जिला प्रशासन के इस स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हो गया है कि एक तरफ जहां शासन अपनी कानूनी लड़ाई हाईकोर्ट में लड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ न्यायालय के पुराने आदेशों के अनुपालन में राजस्व स्तर पर भी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जिले में यह प्रकरण आमजन और प्रशासनिक गलियारों में खासे चर्चा का विषय बना हुआ है।





