18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से पहले लेनी होगी पेरेंट्स की इजाजत, सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार को नोटिस

नाबालिग बच्चों द्वारा सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बेरोक-टोक इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ नामक एनजीओ द्वारा दायर इस याचिका में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने की मांग की गई है, जिसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अकाउंट बनाने के लिए माता-पिता या कानूनी अभिभावक की अनिवार्य भागीदारी और सहमति का मुद्दा सबसे प्रमुख है।
याचिका में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि फेसबुक और स्नैपचैट जैसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म्स बच्चों को महज 13 साल की उम्र में ही अकाउंट खोलने की अनुमति दे देते हैं, जबकि भारतीय कानून के मुताबिक 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति नाबालिग की श्रेणी में आता है। इस कानूनी विसंगति को दूर करने के लिए याचिकाकर्ता ने ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021’ में आवश्यक संशोधन करने या फिर बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए विशेष और कड़े दिशानिर्देश बनाने के निर्देश देने की मांग की है।
मुकदमे में यह भी साफ किया गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को इस बात के लिए पाबंद किया जाए कि वे माता-पिता या कानूनी अभिभावक की वैध सहमति और उनकी पहचान की पुष्टि (ई-केवाईसी) के बिना 18 साल से कम उम्र के किसी भी बच्चे के साथ कोई अनुबंध न करें। यानी जब भी किसी नाबालिग को इंटरनेट या सोशल मीडिया के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए, तो वह प्रक्रिया पूरी तरह से अभिभावकों की निगरानी और कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त व्यवस्था के तहत ही पूरी होनी चाहिए, जो कि सर्विस की प्रकृति और जोखिम स्तर के अनुकूल हो।
याचिका में डिजिटल दुनिया में बच्चों की खुली पहुंच से उत्पन्न होने वाले गंभीर खतरों की फेरिस्त भी रखी गई है। इसमें बताया गया है कि बिना सुरक्षा कवच के इंटरनेट का उपयोग करने से बच्चे ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, मानव तस्करी, डिजिटल व्यवहार की प्रोफाइलिंग, निजी डेटा के दुरुपयोग, साइबर-बुलिंग और उम्र के हिसाब से पूरी तरह अनुपयुक्त व अश्लील सामग्री के संपर्क में आने जैसी गंभीर समस्याओं का लगातार शिकार हो रहे हैं।





