विशेष संरक्षित मझवार जनजाति की गर्भवती महिला व नवजात की घर में प्रसव के दौरान मौत,जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य विभाग की कथित लापरवाही आई सामने, कागजी खानापूर्ति में जुटा प्रशासन…
इलाज में सुस्ती दिखाने वाले प्रभारी बीएमओ मौत के बाद पंचनामा कार्यवाही पूर्ण करने के लिए खुद दौड़े, व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल।

लखनपुर: शासन-प्रशासन द्वारा सुरक्षित प्रसव और मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करने के तमाम दावों के बीच लखनपुर विकासखंड के ग्राम सकरिया से एक बेहद दुखद मामला सामने आया है। यहाँ जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य विभाग के मैदानी अमले के कथित ढुलमुल रवैये के कारण एक विशेष संरक्षित मझवार जनजाति की माँ और उसके नवजात बच्चे की दर्दनाक मौत हो गई।
जब लखनपुर विकासखंड के ग्राम सकरिया में प्रसव के दौरान एक विशेष संरक्षित मझवार जनजाति की माँ और उसके नवजात बच्चे की दर्दनाक मौत हो गई। इस संवेदनशील मामले में जागरूकता के अभाव के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही और संवेदनहीनता भी सामने आ रही है। हैरान करने वाली बात यह है कि जिस जच्चा-बच्चा को बचाने में स्वास्थ्य अमले ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, उसकी मौत के बाद अपनी साख बचाने और पंचनामा की कार्यवाही पूरी करने के लिए प्रभारी बीएमओ (BMO) खुद दल-बल के साथ मृतिका के घर दौड़े।
मिली जानकारी के अनुसार, ग्राम सकरिया निवासी सुखनी मझवार (पति दिनेश मझवार) का परिवार तमिलनाडु में रहकर मजदूरी करता था। बीते 14 जून को ही दिनेश अपनी 8 माह की गर्भवती पत्नी के साथ गांव वापस लौटा था। इसके बाद 21 जून को महिला को जांच के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कुन्नी ले जाया गया था। जांच के दौरान डॉक्टरों ने महिला के शरीर में खून की अत्यधिक कमी (Anemia) और ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) सामान्य से काफी अधिक पाया था। डॉक्टरों ने उसे आयरन सुक्रोज लगाने के लिए दोबारा स्वास्थ्य केंद्र आने तथा बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल अंबिकापुर जाने की सलाह दी थी।
ग्रामीण स्तर पर तैनात मितानीन और स्वास्थ्य कार्यकर्ता का दावा है कि उन्होंने महिला को अस्पताल जाने की सलाह दी थी, लेकिन परिजनों ने घर पर ही प्रसव कराने की बात कही। इस बीच 6 जुलाई को महिला को तीव्र प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों के अनुसार, क्षेत्र में हो रही भारी बारिश और जल्दबाजी के कारण वे महिला को अस्पताल नहीं ले जा सके। आखिरकार गांव की ही एक पारंपरिक ‘सुईंन दाई’ के माध्यम से घर पर ही प्रसव कराने का प्रयास किया गया, जिसके दौरान उचित चिकित्सकीय सुविधाओं के अभाव में माँ और बच्चे दोनों की मौत हो गई।
इस दर्दनाक घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मृतिका के परिजनों ने स्वास्थ्य अमले के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें मितानीन या स्वास्थ्य कार्यकर्ता के आने-जाने या किसी खतरे के बारे में कोई सही जानकारी नहीं दी गई थी। वहीं, महिला की जांच पर्ची में हाई बीपी का उल्लेख तो था, लेकिन उसे नियंत्रित करने के लिए किसी भी दवाई का जिक्र नहीं था।
क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि जो स्वास्थ्य विभाग पीड़ित महिला को सुरक्षित प्रसव के लिए जिला अस्पताल भेजने में नाकाम रहा, वही विभाग मौत की खबर मिलते ही अपनी कमियां छुपाने के लिए सक्रिय हो गया। प्रभारी बीएमओ ने आनन-फानन में मौके पर पहुंचकर पंचनामा की कार्यवाही पूरी की। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग केवल कागजी कोरम पूरा कर अपना दामन बचाने की कोशिश कर रहा है। बहरहाल, जानकारी और सही मार्गदर्शन के अभाव में दो जिंदगियां खत्म हो गईं और मामला अब फाइलों में दफन होने की कगार पर है।





