संपादकीय: ‘भाई मुझे माफ कर दो’ – आदिवासी महिला पुलिसकर्मी की चीखें और शर्मसार होता छत्तीसगढ़: अमेरा से तमनार तक सुलगती अराजकता…

अमित श्रीवास्तव
छत्तीसगढ़ की माटी, जिसे अपनी सहजता, सरलता और शांतिप्रिय स्वभाव के लिए जाना जाता है, आज रायगढ़ के तमनार से आई तस्वीरों के कारण शर्मसार है। जेपीएल कोयला खदान के विरोध की आड़ में जिस तरह की हिंसा और अमानवीयता देखने को मिली, उसने न केवल राज्य की कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि हमारे सामाजिक संस्कारों पर भी गहरा आघात किया है। एक महिला आरक्षक, जो स्वयं इसी माटी की बेटी और आदिवासी समाज का गौरव है, उसे उन्मादी भीड़ द्वारा आधा किलोमीटर तक दौड़ाया जाना, उसके साथ मारपीट करना और फिर उसके कपड़े फाड़कर उसे अर्धनग्न कर देना, किसी भी सभ्य समाज के लिए आत्मचिंतन का विषय होना चाहिए। वायरल वीडियो में उस लाचार बहन की सिसकियां और “भाई मुझे माफ कर दो” की गुहार यह चीख-चीख कर कह रही है कि अब भीड़ के भीतर से कानून का डर और इंसानियत दोनों विदा हो चुके हैं।
यह विडंबना ही है कि जिस छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के सम्मान और उनके हितों की रक्षा के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, उसी राज्य में एक आदिवासी महिला पुलिसकर्मी को उन्हीं के बीच के कुछ अराजक तत्वों द्वारा इस कदर अपमानित किया गया। यह घटना हमें सरगुजा के अमेरा से लेकर मैनपाट और अब तमनार तक की उन कड़ियों को जोड़ने पर मजबूर करती है, जहाँ भीड़ अचानक हिंसक हो जाती है और कानून को अपने पैरों तले रौंदने लगती है। क्या यह महज एक इत्तेफाक है या फिर कोई गहरी साजिश? सवाल यह उठता है कि आखिर छत्तीसगढ़ जैसा शांत प्रदेश अचानक हिंसा की प्रयोगशाला कैसे बनने लगा? क्या लोगों के मन से कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है, या फिर कुछ ऐसी ‘अदृश्य ताकतें’ सक्रिय हैं जो भोले-भाले ग्रामीणों के असंतोष को ईधन बनाकर राज्य की फिजाओं में जहर घोल रही हैं।
इस पूरे प्रकरण में सत्तासीन भाजपा और उसके जमीनी संगठन की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगते हैं। जब गारे पेलमा सेक्टर-1 को लेकर ग्रामीण महीनों से आंदोलित थे, तो सरकार और संगठन के लोग उनके बीच जाकर उनकी शंकाओं का समाधान करने में विफल क्यों रहे? लोकतंत्र में संवाद ही सबसे बड़ा हथियार होता है, लेकिन यहाँ संवादहीनता की एक ऐसी खाई नजर आती है जिसे अब हिंसा से भरा जा रहा है। सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता अगर जनता के बीच अपनी पैठ नहीं बना पा रहे हैं, तो इसका सीधा लाभ उन शक्तियों को मिल रहा है जो पर्दे के पीछे बैठकर अशांति की पटकथा लिख रही हैं। जनसुनवाई के स्थान में बदलाव से लेकर सड़क दुर्घटना तक की कड़ियों ने जो उग्र रूप लिया, वह बताता है कि प्रशासन स्थिति का सही आकलन करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
तमनार की यह घटना छत्तीसगढ़ के माथे पर लगा वह कलंक है जिसे केवल आरोपियों की गिरफ्तारी से नहीं धोया जा सकता। एक महिला पुलिस इंस्पेक्टर को लात मारना और फिर एक आरक्षक को अर्धनग्न कर देना यह दर्शाता है कि यह आंदोलन अब केवल खदान का विरोध नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर राज्य की सत्ता और व्यवस्था को चुनौती है। यदि आज इन “अदृश्य ताकतों” को नहीं कुचला गया और जनता के बीच खोया हुआ विश्वास वापस नहीं लाया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब अराजकता का यह धुआं पूरे प्रदेश को अपनी चपेट में ले लेगा। अमेरा से लेकर तमनार तक की ये घटनाएं चेतावनी हैं कि अब केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि राज्य की आत्मा को बचाने के लिए एक ठोस राजनीतिक और सामाजिक संकल्प की आवश्यकता है।





