सम्पादकीय

ऑपरेशन सिंदूर’ में सैन्य बढ़त के बाद संघर्ष विराम: क्या भारत फिर चूका? पूर्ववर्ती युद्धों की राजनीतिक वार्ताओं की विफलता पर भाजपा अब किस मुंह से कांग्रेस को घेरेगी?

अमित श्रीवास्तव
संपादक हिन्द शिखर

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारतीय सेना की बहादुरी और रणनीतिक बढ़त के बावजूद, संघर्ष विराम की घोषणा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सैन्य विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि क्या भारत ने एक बार फिर रणनीतिक रूप से अपनी मजबूत स्थिति को कमजोर कर दिया है।

सैन्य बढ़त के बाद राजनीतिक विराम: इतिहास की पुनरावृत्ति?

यह घटनाक्रम भारत के पूर्ववर्ती युद्धों के बाद की राजनीतिक वार्ताओं की याद दिलाता है, जहाँ सैन्य सफलताओं के बावजूद, राजनीतिक मंच पर भारत को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। 1948, 1965 और 1971 के युद्धों के बाद की राजनीतिक वार्ताओं में भारत को कई बार अपनी जमीनी जीत का पूरा राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाया।

1948 का युद्ध: अधूरा समाधान

1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद, संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से संघर्ष विराम हुआ, लेकिन कश्मीर मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। भारत ने युद्ध में महत्वपूर्ण क्षेत्रों को वापस जीता, लेकिन राजनीतिक वार्ता में इन जीतों को पूरी तरह से भुना नहीं पाया।

1965 का युद्ध: ताशकंद समझौता

1965 के युद्ध में भी भारत ने सैन्य रूप से महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की, लेकिन ताशकंद समझौते में जीती हुई जमीन वापस करनी पड़ी। इस समझौते को लेकर भारत में काफी असंतोष था, क्योंकि कई लोगों को लगा कि भारत ने अपनी सैन्य जीत को राजनीतिक मेज पर गंवा दिया।

1971 का युद्ध: शिमला समझौता

1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक जीत के बाद, शिमला समझौते ने पाकिस्तान को विभाजित करने और बांग्लादेश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि, इस समझौते में भी कश्मीर मुद्दे का कोई ठोस समाधान नहीं निकला, और इसे भारत की राजनीतिक कमजोरी के रूप में देखा गया।

भाजपा और पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना

भाजपा अक्सर पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों को युद्धों के बाद की राजनीतिक वार्ताओं में उनकी ‘असफलता’ के लिए घेरती रही है। अब, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद, विपक्षी दल भाजपा से यह सवाल नहीं पूछेगें कि क्या उनकी सरकार भी उसी रास्ते पर चल रही है। क्या भाजपा सरकार, जो अपनी मजबूत विदेश नीति और निर्णायक नेतृत्व का दावा करती है, पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही राजनीतिक रूप से कमजोर साबित हो रही है?

विश्लेषकों की राय

टीवी चैनलों में कई राजनीतिक और सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य जीत को राजनीतिक लाभ में बदलने के लिए कूटनीतिक कौशल और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद, यह देखना होगा कि भारत सरकार इस स्थिति को कैसे संभालती है और क्या वह अपनी सैन्य बढ़त को राजनीतिक रूप से भुनाने में सफल होती है।

जनता की प्रतिक्रिया

आम जनता में भी इस मुद्दे को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया है। कुछ लोग सैन्य जीत से संतुष्ट हैं, जबकि अन्य राजनीतिक वार्ता में भारत की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि सरकार देश के हितों की रक्षा करे और सैन्य जीत को व्यर्थ न जाने दे।

निष्कर्ष

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद का संघर्ष विराम भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह देखना बाकी है कि सरकार इस स्थिति को कैसे संभालती है और क्या वह पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही राजनीतिक रूप से कमजोर साबित होती है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत की सैन्य और राजनीतिक रणनीति पर बहस छेड़ दी है, और यह आने वाले समय में भारतीय राजनीति को प्रभावित करेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button