सूरजपुर

सूरजपुर : एन.एच.एम. संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी संघ की एक सूत्रीय मांग नियमितिकरण हेतु आज सातवाँ दिन भी हड़ताल जारी

विष्णु कसेरा, हिंद शिखर समाचार सूरजपुर– अनिष्चितकालीन हड़ताल का सातवाँ दिन एन0एच0एम0 संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी संघ की एक सूत्रीय मांग नियमितिकरण को लेकर अनिष्चितकालीन धरना में बैठे है। संविदा स्वास्थ्य कमर्चारियों के समर्थन में आये सत्ता पक्ष के विधयक और मंत्री ने भी माननीय मुख्यमंत्री महोदय और माननीय स्वास्थ्य मंत्री महोदय को पत्र लिखकर कांग्रेस के जन घोषणा पत्र में लिखा वादा याद दिलाया।
विपक्ष में रहकर वादों की सीढ़ी से सत्ता के षिखर को छूने वाले नेता यह भूल जाते हैं की चुनाव हर 05 साल में होता है और जनता इस बात को भलीभांति याद रखती है कि किसने उसके साथ क्या बर्ताव किया है। बात करे छत्तीसगढ़ की तो आज भी जोगी काल के 3 साल कर्मचारी का हाल बेहाल’’ को कर्मचारियों ने आज तक नही भुलाया है जिस प्रकार आंदोलनों को उस समय कुचला गया उसने जनता और कर्मचारियों के मन में जो आक्रोष पैदा किया वह अंतिम समय तक बना रहा। रमन सरकार के 15 वर्ष के शासनकाल में भी अंतिम वर्ष को दमन काल का नाम दिया गया जिसमें आंदोलनों को उनकी छवि के विपरीत बुरी तरह से कुचला गया और सत्ता पक्ष के नुमाइंदे सीधे तौर पर कर्मचारियों को ही दोषी बताने लगे जबकि संच्चाई यह है उन्होने खुद उनके मंच पर जाकर उनसे लोक लुभावने वादे किये थे जिनके प्रमाण चीख चीख कर इस बात की गवाही दे रहे थे कि कुछ तो गलत हो रहा है।
वर्तमान में पुरा देष कोरोना महामारी से जूझ रहा है इस दौर में भी स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत कार्यरत एनएचएम कर्मचारी हड़ताल पर उतर गए है उनकी मांग नियमितिकरण की है लेकिन जिन्होने घोषणापत्र का निर्माण किया और सत्ता में आने से पहले जिनसे सभी वर्गो की सबसे ज्यादा चर्चा हुई वही स्वास्थ्य मंत्री आज कह रहे है कि नियमितिकरण की बात नही की थी बात हुई थी किसी को भी नौकरी से नही हटाने की लेकिन सोषल मिडिया में जो विडियों, जो अखबारो की कतरन और जो पत्र सार्वजनिक हो रहे है वह कह रहे है इस बात को की अनियमित, संविदा और दैनिक वेतनभोगियों के नियमितिकरण की बात हुई थी और यह वादों में भी शामिल था। जमीनी हकीकत यह है कि कोरोना ने सरकार के आर्थिक हालात की कमर तोड़ दी है और इस बात से कोई इंकार भी नही कर सकता लेकिन जिस प्रकार पहले संसदीय सचिव, उसके बाद विधानसभा भवन का निर्माण और फिर एल्डरमैन की नियुक्ति हुई और कई योजनाओं का पदार्पण हुआ वह यह सवाल खड़े कर रहा है कि क्या वास्तव में वादों को पुरा करने के लिए धन की कमी है लेकिन इस सबसे परे हटकर भी एक सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन का सही समय है इस पर सबका जवाब होगा कि-बिल्कुल सही, अगर नही भी तो सत्ता पक्ष में बैठे रहनुमाओं की यह जिम्मेदारी नही है कि वह उन कर्मचारियों को अपने पास बुलाकर चर्चा करें, स्थिति से अवगत कराएं और उन्हे भरोसा दिलाएं और उनमें यह विष्वास जगाए कि जो वादा उनसे किया गया है वह अवष्य पुरा होगा। जब विपक्ष में रहते हुए उनकी बात कर्मचारियों ने इतनी गंभीरता से सुनी है तो फिर आज तो वह सत्ता में है कर्मचारी आखिर अनसुना कैसे कर देंगे। षिक्षक भर्ती के आंदोलन में यह बात देखने को मिली की डेढ़ साल से नियुक्ति की बांट जोह रहे अभ्यार्थियों को सत्ता पक्ष की ओर से आष्वासन की घुटटी मिली और हड़ताल त्याग दिया, तो फिर एनएचएम कर्मचारियों के साथ यह हालात क्यो बन रहे है वह भी तब जब प्रदेष में सबसे ज्यादा अभी उन्ही की है क्या यह नही हो सकता था कि उनसे संवाद किया जाए उन्हे भरोसा दिलाया जाए कि जो कहा किया है वह अवष्य पुरा किया जाएगा और यही सरकार पूरी करेगी क्योकि आने वाले समय में यह कर्मचारी भी नौकरी में वापस आ जाऐंगे और सत्ताधीष भी बने रहेगे लेकिन इस विपरीत समय में इलाज के अभाव में जो अपने परिजनों को खो देखें उनकी भरपाई कभी नही होगी। तलवारें दोनो ओर से खींची हुई है लेकिन सच यह हेै कि घायल आम जनता हो रही है रहनुमाओं की यह जिम्मेदारी है कि इस हालात को समझे और इस टकराव को टाले वरना सत्ता का क्या है आज इसकी तो कल उसकी।

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