पार्ट टाइम बीएड का खेल: 120 दिन की प्रत्यक्ष कक्षाओं का नियम ताक पर, एक ही समय में दो जगह कैसे मौजूद हैं शिक्षक, बिना जांचे धड़ल्ले से एनओसी बांट रहे शिक्षा विभाग के अधिकारी…

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद( NCTE) द्वारा देश में शिक्षकों की शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया तीन वर्षीय पार्ट टाइम बीएड पाठ्यक्रम वर्तमान में जवाबदेही और पारदर्शिता के मोर्चे पर पूरी तरह फेल साबित हो रहा है। परिषद के नियमों के मुताबिक इस पाठ्यक्रम में प्रतिवर्ष न्यूनतम एक सौ बीस दिनों की प्रत्यक्ष फेस-टू-फेस कक्षाएं संचालित करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इन निर्धारित दिनों में से कम से कम पचहत्तर प्रतिशत दिनों में यानी साल भर में न्यूनतम नब्बे दिन छात्र-शिक्षक की कॉलेज के भीतर भौतिक उपस्थिति अनिवार्य की गई है, जिसके बिना किसी भी परिस्थिति में परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन जब इस कड़े नियम को धरातल की हकीकत की कसौटी पर कसा जाता है, तो कागजी दावों और वास्तविक सच्चाई के बीच एक बहुत बड़ा घालमेल साफ नजर आता है।
इस एक सौ बीस दिनों के अनिवार्य कोटे को पूरा करने के लिए स्कूलों में होने वाले ग्रीष्मकालीन अवकाश, शीतकालीन छुट्टियों और साल भर के शनिवार-रविवार जैसे वीकेंड्स का सैद्धांतिक गणित पेश किया जाता हैं। यह दावा किया जाता है कि नौकरीपेशा शिक्षक अपने अवकाश के दिनों का त्याग करके विश्वविद्यालय में अपनी हाजिरी पूरी कर रहे हैं। परंतु सोचने वाली बात यह है कि यदि कोई सरकारी या निजी स्कूल का शिक्षक अपने गृह जिले या कार्यस्थल से चार सौ किलोमीटर दूर बैठे किसी विश्वविद्यालय से यह कोर्स कर रहा है, तो क्या उसके लिए व्यावहारिक रूप से यह संभव है कि वह लगातार तीन सालों तक हर हफ्ते सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करे। बिना किसी संस्थागत अवकाश या विभागीय सप्लीमेंट्री लीव के इतनी लंबी दूरी से आकर शत-प्रतिशत वर्कशॉप और कक्षाओं में शामिल होना एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब किसी के पास नहीं है।
इस पूरे खेल में सबसे हैरान करने वाली बात शासन और प्रशासन के स्तर पर बरती जा रही घोर लापरवाही है। नियमों के अनुसार कोई भी शासकीय शिक्षक जिला शिक्षा अधिकारी या अपने सक्षम उच्च अधिकारियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी एनओसी लिए बिना किसी भी प्रकार का कोर्स या उच्च शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। प्रशासनिक स्तर पर यह देखना जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की जिम्मेदारी है कि चार सौ किलोमीटर दूर नियमित पाठ्यक्रम के लिए एनओसी मांग रहा शिक्षक आखिर अपने कर्तव्यों और बच्चों की पढ़ाई के साथ न्याय कैसे करेगा। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा बिना सोचे-समझे और बिना जमीनी हकीकत की समीक्षा किए आंख मूंदकर धड़ल्ले से एनओसी जारी कर दी जाती है। प्रशासन की यह ढीली कार्यप्रणाली सीधे तौर पर इस विसंगति को वैधानिक कवच प्रदान करने का काम करती है।
यही वह प्रशासनिक लूपहोल है जिसकी वजह से दूरदराज के क्षेत्रों में नौकरी कर रहे शिक्षक अपने स्कूलों में बाकायदा उपस्थित रहकर सरकारी वेतन उठा रहे होते हैं और ठीक उसी समय बीएड कॉलेजों के हाजिरी रजिस्टर में भी उनकी भौतिक उपस्थिति दर्ज हो रही होती है। संस्थाओं द्वारा भारी भरकम अवैध फीस अटेंडेंस मेंटेनेंस चार्ज के नाम पर मोटी रकम वसूल कर घर बैठे हाजिरी लगाने का यह खेल न केवल नियमों का खुला मखौल उड़ा रहा है, बल्कि भविष्य के शिक्षकों की योग्यता के साथ भी बड़ा खिलवाड़ कर रहा है।
इस गंभीर विषय पर अब व्यापक जन-जागरूकता और कड़े प्रशासनिक हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता है। जब तक इस पूरे सिस्टम में जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, एनओसी जारी करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी नियत नहीं होगी और डिजिटल सर्विलांस के माध्यम से छात्रों की वास्तविक उपस्थिति की जांच नहीं होगी, तब तक पार्ट टाइम बीएड जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं केवल कुछ भ्रष्ट संस्थानों की तिजोरियां भरने और बिना कॉलेज गए कागजी डिग्रियां बांटने का जरिया मात्र बनी रहेंगी। जागरूक नागरिकों और शिक्षाविदों को इसं सांठगांठ के खिलाफ आवाज उठानी होगी ताकि देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को योग्यताहीन तत्वों के चंगुल से बचाया जा सके।





