अम्बिकापुर

अग्निकांड के बाद कागजी घोड़े दौड़ाता प्रशासन: जांच कमेटी का गठन और पटाखा गोदामों को शहर से बाहर करने का फरमान, क्या रस्म अदायगी से टलेंगे बड़े हादसे?

अम्बिकापुर के हृदय स्थल राममंदिर के सामने 23 अप्रैल को मुकेश प्लास्टिक और पटाखा दुकान में हुई भीषण आगजनी ने पूरे शहर को दहला कर रख दिया है। इस अग्निकांड में करोड़ों की संपत्ति जलकर खाक हो गई और प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खुल गई। हादसे के बाद अब जिला प्रशासन की नींद टूटी है और कलेक्टर अजीत वसंत ने आनन-फानन में एक संयुक्त जांच दल का गठन करने के साथ-साथ शहर के भीतर संचालित सभी पटाखा गोदामों को बाहर शिफ्ट करने का आदेश दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन हमेशा किसी बड़े हादसे और तबाही का इंतजार करता है? वर्षों से घनी आबादी के बीच चल रहे इन खतरनाक गोदामों पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
राममंदिर के सामने हुई इस घटना की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी ने जिस संयुक्त जांच दल का गठन किया है, उसमें अनुविभागीय दण्डाधिकारी अम्बिकापुर, नगर पुलिस अधीक्षक अम्बिकापुर, क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला के प्रतिनिधि, जिला नगर सेना के अधिकारी और नगर पालिक निगम के कार्यपालन अभियंता को शामिल किया गया है। इस भारी-भरकम कमेटी को सात दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। हालांकि, यह जांच कितनी प्रभावी होगी, इस पर संशय है क्योंकि जिस समय ये अवैध और असुरक्षित दुकानें घनी बस्तियों में फल-फूल रही थीं, तब यही जिम्मेदार अधिकारी और विभाग मूकदर्शक बने हुए थे।
इस अग्निकांड से सबक लेने का दावा करते हुए अब प्रशासन ने शहर के 08 स्थाई पटाखा लाइसेंसधारियों और 02 पटाखा निर्माताओं के ठिकानों को शहर से बाहर खदेड़ने की तैयारी शुरू की है। इनमें मो. जुनैद, सतीश कुमार जैन, विनोद कुमार जैन, रोशनलाल गोयल, आशीष कुमार अग्रवाल, अजय कुमार गोयल, गौरीशंकर पाण्डेय, मुकेश कुमार अग्रवाल और मनोज कुमार मारू के नाम शामिल हैं। अनुविभागीय दण्डाधिकारी को अब यह पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई है कि क्या ये गोदाम रिहायशी क्षेत्रों में हैं और क्या वहां दमकल की गाड़ियां पहुंच सकती हैं। यह अपने आप में विरोधाभासी है कि जो मानक लाइसेंस देते समय अनिवार्य होने चाहिए थे, उनकी जांच अब एक बड़े हादसे के बाद “आकस्मिक” रूप से की जा रही है।
प्रशासन की इस सक्रियता पर जनता सवाल उठा रही है कि क्या यह केवल जन-आक्रोश को शांत करने के लिए किया जा रहा एक दिखावा है। संकरी गलियों में बारूद और प्लास्टिक का अवैध भंडारण जगजाहिर रहा है, फिर भी अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज किया। सात दिनों के भीतर रिपोर्ट और वैधानिक कार्यवाही का भरोसा दिलाना कागजों पर तो अच्छा लगता है, लेकिन धरातल पर इन रसूखदार व्यवसायियों को शहर से बाहर करना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। अम्बिकापुर की जनता अब केवल कमेटियों और जांच रिपोर्ट से संतुष्ट होने वाली नहीं है, उसे शहर की सुरक्षा के लिए ठोस और स्थाई समाधान की दरकार है।

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