कोरबा

शासकीय भूमि पर फर्जी कब्जे का मामला पहुंचा छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग, कोरबा कलेक्टर से मांगा जवाब

अरविंद शर्मा कोरबा |
ग्राम तानाखार की शासकीय भूमि पर फर्जी तरीके से नामांतरण और कब्जा करने का मामला अब मानव अधिकार आयोग तक पहुंच गया है। ग्रामवासियों द्वारा की गई शिकायत के आधार पर आयोग ने कोरबा कलेक्टर को पत्र जारी करते हुए 28 अगस्त 2025 तक जवाब तलब किया है। यह पत्र छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग, रायपुर द्वारा 24 जुलाई 2025 को जारी किया गया, जिसमें कहा गया है कि शिकायतकर्ताओं की ओर से अधिग्रहित भूमि पर अवैध रूप से नाम चढ़ाकर कब्जा किए जाने की जानकारी दी गई है, जो गंभीर जांच की मांग करता है।

मामले की जड़ वर्ष 1974-75 में देखी जा सकती है, जब तानाखार की खसरा नंबर 731/9, रकबा 0.619 हेक्टेयर भूमि को कृषि प्रयोजन के लिए महेशपुर निवासी मोर्ध्वजपुरी के नाम आबंटित किया गया था। लेकिन न तो उस व्यक्ति ने कभी कब्जा लिया और न ही खेती की। कई वर्षों तक अनुपयोगी रही इस जमीन पर वर्ष 2020 में अचानक हलचल शुरू होती है, जब कटघोरा निवासी अशफाक अली द्वारा उक्त भूमि को 10 लाख रुपये में तौकीर अहमद के नाम मुख्तियारनामा के माध्यम से बेच दिया जाता है। यह सौदा तब और अधिक संदिग्ध हो जाता है जब सामने आता है कि यह भूमि शासकीय है और जल संसाधन विभाग द्वारा अधिग्रहित की गई थी।

इस पूरे प्रकरण में पटवारी से लेकर उपपंजीयक कार्यालय तक की मिलीभगत की आशंका जाहिर की गई है। तत्कालीन पटवारी जितेश जायसवाल पर आरोप है कि उन्होंने जानबूझकर इस शासकीय भूमि को निजी संपत्ति दिखाते हुए न केवल उसका नक्शा और चौहद्दी तैयार करवाई, बल्कि उसका 22 कालम खसरा बनवाकर रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी करवा दी। ₹92,000 का ई-स्टांप लगाकर कटघोरा उपपंजीयक कार्यालय में रजिस्ट्री कर दी गई और इसके बाद भूमि को तौकीर अहमद के नाम पर दर्ज भी करा दिया गया।

शिकायतकर्ताओं ने अपनी आपत्ति में यह भी बताया है कि राजस्व रिकॉर्ड में बिना वैध प्रक्रिया के नामांतरण कर दिया गया और बाद में B-खसरा, 5 साला जैसे दस्तावेजों में भी इंद्राज हो गया। इसके लिए हल्का पटवारी और आरआई द्वारा विशेष रूप से प्रयास किया गया, ताकि भूमि को राष्ट्रीय राजमार्ग-130 के किनारे कृषि भूमि दिखाकर एक बड़े घोटाले का हिस्सा बनाया जा सके।

गौरतलब है कि इस मामले की शिकायत रामकुमार और अन्य ग्रामीणों द्वारा की गई थी, जिसमें तौकीर अहमद को प्रतिवादी बनाया गया है। आयोग ने इस शिकायत को गंभीर मानते हुए संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है। आयोग के निर्देशानुसार यदि तय समयसीमा में जवाब नहीं दिया गया, तो आयोग स्वतः संज्ञान लेकर कड़ी कार्यवाही कर सकता है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि शासन और प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया तो वे सड़क पर उतरकर आंदोलन करेंगे। उनके अनुसार यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, अधिकार और पहचान का सवाल है। तानाखार में जो हुआ है, वह शासन की आंखों में धूल झोंककर किए गए सुनियोजित भ्रष्टाचार का उदाहरण है, जिसमें सरकारी तंत्र का हर स्तर एक अदृश्य गठजोड़ की तरह काम करता दिख रहा है।

अब यह देखने की बात है कि कलेक्टर डॉ. अजित वसंत इस पूरे प्रकरण में क्या रुख अपनाते हैं। क्या वह इस भूमाफियागिरी और विभागीय सांठगांठ पर त्वरित और सख्त कार्रवाई करेंगे, या यह मामला भी अन्य जमीनी घोटालों की तरह फाइलों में दब जाएगा?

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