जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत: पुत्र की लंबी आयु के लिए एक महाव्रत, जानिए व्रत विधि और 2025 का शुभ मुहूर्त

हिन्द शिखर समाचार – भारत के कुछ प्रमुख राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में माताओं द्वारा अपने पुत्रों की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत है जीवित्पुत्रिका, जिसे लोकप्रिय रूप से जितिया भी कहा जाता है। यह व्रत तीन दिनों तक चलता है और हर दिन का अपना विशेष महत्व है।
जीवित्पुत्रिका व्रत का धार्मिक महत्व
यह व्रत महाभारत काल से जुड़ा है। माना जाता है कि जब अश्वत्थामा ने अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुण्य और तप के प्रभाव से उस बालक को पुनर्जीवित किया था। तब से ही यह व्रत पुत्र की रक्षा और कल्याण के लिए किया जाता है। माताएं इस दिन निर्जला (बिना पानी पिए) उपवास रखती हैं, जो उनके असीम त्याग और प्रेम का प्रतीक है।
2025 में जितिया व्रत की तिथियां और शुभ मुहूर्त
जीवित्पुत्रिका व्रत की तिथियां और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:
अश्विन कृष्ण अष्टमी: 14 सितंबर 2025 (रविवार)
अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 14 सितंबर 2025, सुबह 05:04 बजे से
अष्टमी तिथि का समापन: 15 सितंबर 2025, सुबह 03:06 बजे तक
तीन दिवसीय व्रत की विधि
जीवित्पुत्रिका व्रत की प्रक्रिया तीन दिनों में पूरी होती है, जिसे क्रमशः नहाई-खाई, खर-जितिया और पारण के नाम से जाना जाता है।
नहाई-खाई (पहला दिन – 13 सितंबर, शनिवार): इस दिन माताएं सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करती हैं और पूजा-अर्चना के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं, जिसे ओठघन कहते हैं। भोजन में लहसुन और प्याज का उपयोग नहीं होता। मुख्य रूप से कद्दू की सब्जी और चावल बनाए जाते हैं।
खर-जितिया (दूसरा दिन – 14 सितंबर, रविवार): यह सबसे महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन माताएं निर्जला उपवास रखती हैं, जिसका अर्थ है कि वे पूरे दिन और रात अन्न और जल का त्याग करती हैं। इस दिन जितिया देवी की पूजा होती है और व्रत कथा सुनी जाती है।
पारण (तीसरा दिन – 15 सितंबर, सोमवार): व्रत का तीसरा और अंतिम दिन पारण कहलाता है। इस दिन सूर्योदय के बाद माताएं पूजा करती हैं और व्रत का समापन करती हैं। पारण का शुभ मुहूर्त 15 सितंबर, सुबह 06:27 बजे के बाद है।
जितिया व्रत में ‘चिलो’ और ‘सियारो’ की कहानी
जितिया व्रत की एक अनोखी परंपरा ‘चिलो’ (चील) और ‘सियारो’ (सियारिन) की कथा से जुड़ी है। माना जाता है कि एक चील और एक सियारिन ने एक साथ इस व्रत को करने का निर्णय लिया। सियारिन ने लालच में आकर व्रत के दौरान कुछ खा लिया, जबकि चील ने ईमानदारी से व्रत का पालन किया। इस कथा का उद्देश्य यह बताना है कि व्रत का फल तभी मिलता है जब उसे पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से किया जाए।
पारण के विविध व्यंजन
पारण का भोजन क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग होता है-
नोनी का साग और झींगा मछली: बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह पारण का पारंपरिक भोजन है।
दही-चूड़ा और जलेबी: बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों में कई जगहों पर यह खाया जाता है। ये
अरवा चावल और साग: कुछ क्षेत्रों में महिलाएं अरवा चावल और मौसमी साग बनाकर खाती हैं।
मीठी रोटी और सब्ज़ियां: शहरी इलाकों में कई परिवारों में मीठी रोटी या पूड़ी और कोई भी साधारण सब्ज़ी बनाकर पारण किया जाता है।
मीठे पकवान: कुछ जगहों पर व्रत का समापन पुआ या खीर जैसे मीठे पकवानों से किया जाता है, जो शुभ माना जाता है।
भगवान जीमूतवाहन: जितिया व्रत के नायक
जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत की कथा भगवान जीमूतवाहन के त्याग और परोपकार की अद्भुत कहानी पर भी आधारित है। जीमूतवाहन एक महान और दयालु राजा थे, जिन्होंने अपनी प्रजा और दूसरों के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उन्हें इस व्रत का नायक माना जाता है।
कौन थे भगवान जीमूतवाहन?
जीमूतवाहन गंधर्वों के राजा थे। वे अत्यंत दयालु और परोपकारी स्वभाव के थे। सत्ता और राजसी वैभव में उनका मन नहीं लगता था। इसलिए, उन्होंने अपना राजपाट अपने भाइयों को सौंप दिया और खुद वानप्रस्थ आश्रम में रहने के लिए जंगल चले गए।
नाग और गरुड़ की कहानी
जीमूतवाहन जब जंगल में रहते थे, तब उन्होंने देखा कि एक नाग (साँप) परिवार बहुत दुखी है। पूछताछ करने पर उन्हें पता चला कि नागों और गरुड़ के बीच एक समझौता हुआ है। इस समझौते के अनुसार, हर दिन एक नाग गरुड़ का भोजन बनने के लिए जाता था ताकि गरुड़ बाकी नागों को न मारे। जिस दिन जीमूतवाहन ने यह देखा, उस दिन शंखचूड़ नामक एक नाग की बारी थी।
शंखचूड़ और उसकी बूढ़ी माँ को देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने तय किया कि वे उस नाग की जान बचाएंगे। जब गरुड़ आया, तो जीमूतवाहन स्वयं उसके सामने चले गए। गरुड़ ने बिना देखे ही जीमूतवाहन को अपना भोजन समझकर उठा लिया। जब गरुड़ को अपनी गलती का अहसास हुआ, तो वह आश्चर्यचकित रह गये।
त्याग और वरदान
जीमूतवाहन के इस महान त्याग और परोपकार को देखकर गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। उसने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और यह भी वचन दिया कि वह अब से कभी भी नागों को नहीं मारेगा।
इसी महान कथा के कारण, जीवित्पुत्रिका व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। माताएं उनकी मूर्ति बनाकर उनका पूजन करती हैं और उनसे अपने पुत्रों की लंबी आयु और सुरक्षा का वरदान मांगती हैं। जीमूतवाहन का यह बलिदान, एक माँ के अपने पुत्र के प्रति त्याग और प्रेम को दर्शाता है, यही कारण है कि यह कथा जितिया व्रत का अभिन्न अंग है।
यह व्रत न सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह एक मां और उसके बच्चे के बीच के पवित्र रिश्ते और बिना शर्त प्रेम का भी प्रतीक है।




