
जांजगीर-चांपा।
छत्तीसगढ़ के शिक्षा इतिहास के सबसे बड़े फर्जीवाड़े में से एक ‘बिर्रा नकल कांड’ में लगभग 18 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद न्याय की जीत हुई है। जांजगीर-चांपा जिला न्यायालय के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गणेश राम पटेल की अदालत ने इस बहुचर्चित प्रकरण में अपना निर्णायक फैसला सुनाते हुए तत्कालीन टॉपर पोरा बाई, परीक्षा केंद्र के मुख्य कर्ताधर्ता प्राचार्य फूलसाय, और उनके सहयोगियों शिवलाल व दीपक सिंह जाटव सहित पांच लोगों को गंभीर अपराधों का दोषी पाया है। न्यायालय ने सभी दोषियों को पांच-पांच वर्ष की सख्त जेल की सजा और पांच हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है।
प्राचार्य की मिलीभगत और व्यवस्था से खिलवाड़
इस पूरे फर्जीवाड़े की नींव जांजगीर के बिर्रा परीक्षा केंद्र पर रखी गई थी। अदालत की कार्यवाही में यह साफ हुआ कि यह केवल एक छात्रा की निजी धोखाधड़ी नहीं थी, बल्कि इसमें तत्कालीन प्राचार्य फूलसाय की भूमिका सबसे संदिग्ध और महत्वपूर्ण रही। प्राचार्य ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए परीक्षा की गोपनीयता और पवित्रता को ताक पर रख दिया था। उन्होंने शिवलाल और दीपक सिंह जाटव जैसे अन्य आरोपियों के साथ मिलकर एक संगठित आपराधिक साजिश रची। जाँच में पाया गया कि प्राचार्य की निगरानी में ही केंद्राध्यक्ष की नियुक्ति से लेकर उत्तरपुस्तिकाओं के रखरखाव तक में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई थी।
फर्जी टॉप का सफर: 484 अंक और बदली हुई लिखावट
यह विवाद वर्ष 2008 की हायर सेकेंडरी बोर्ड परीक्षा के परिणामों के बाद शुरू हुआ। छात्रा पोरा बाई ने 500 में से 484 अंक प्राप्त कर पूरे प्रदेश की प्रावीण्य सूची (Merit List) में सर्वोच्च स्थान हासिल किया था। इस असाधारण उपलब्धि पर जब संदेह हुआ, तो माध्यमिक शिक्षा मंडल ने मामले की गहन पड़ताल शुरू की। फोरेंसिक और विभागीय जांच में यह प्रमाणित हुआ कि जिन उत्तरपुस्तिकाओं के दम पर छात्रा को टॉपर बनाया गया, उनमें लिखावट छात्रा की थी ही नहीं। असली उत्तरपुस्तिकाओं को हटाकर बाहर से तैयार की गई कॉपियों को रिकॉर्ड में शामिल किया गया था।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपियों ने आईपीसी की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत अपराध किया है। कोर्ट ने प्रकरण से जुड़ी सभी जब्त सामग्रियों—जैसे प्राचार्य के नियुक्ति आदेश, सील-मुहरें, उपस्थिति पत्रक, बैठक व्यवस्था विवरण और स्टॉक रजिस्टर—को सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। ये दस्तावेज इस बात का पुख्ता प्रमाण थे कि कैसे पूरी व्यवस्था को बंधक बनाकर एक फर्जी टॉपर तैयार किया गया। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि ऐसे कृत्यों से न केवल प्रतिभावान छात्रों का मनोबल टूटता है, बल्कि शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता भी समाप्त होती है।
निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए मिली सजा
साल 2020 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसे अभियोजन पक्ष ने चुनौती दी। सत्र न्यायालय ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को आधार मानते हुए पूर्व के निर्णय को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि आरोपियों द्वारा पूर्व में न्यायिक हिरासत में बिताई गई अवधि (जैसे पोरा बाई के 167 दिन और शिवलाल के 238 दिन) को उनकी मूल सजा में धारा 428 के तहत समायोजित किया जाएगा।




