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सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर लगाई अंतरिम रोक अगली सुनवाई 12 को, CJI की दो टूक— “हमें सामान्य वर्ग की शिकायतों से कोई लेना-देना नहीं, आरक्षित समुदायों की सुरक्षा सर्वोपरि

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जाति-आधारित भेदभाव को लेकर अधिसूचित नए नियमों पर देशव्यापी विरोध के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की खंडपीठ ने इन नए नियमों के कार्यान्वयन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि नए नियमों में प्रयुक्त भाषा ‘अस्पष्ट’ है और इसमें अधिकारों के दुरुपयोग की स्पष्ट गुंजाइश दिखती है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जब तक इस मामले का अंतिम समाधान नहीं हो जाता, तब तक 2012 के पुराने विनियम ही प्रभावी रहेंगे। इस मामले की अगली निर्णायक सुनवाई 19 मार्च को निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि कोर्ट का मुख्य उद्देश्य सामान्य श्रेणी की आपत्तियों पर विचार करना नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें सामान्य श्रेणी की शिकायतों से कोई लेना-देना नहीं है। हमारी प्राथमिकता और चिंता केवल यह है कि आरक्षित समुदायों (SC/ST/OBC) के सदस्यों के लिए मौजूदा शिकायत निवारण तंत्र पूरी तरह सुरक्षित और यथावत बना रहे।” चीफ जस्टिस ने आगे भावुक होते हुए कहा कि आजादी के 75 वर्षों के बाद भी हम समाज को जातियों के बंधनों से पूरी तरह मुक्त नहीं कर पाए हैं, जबकि हमारा लक्ष्य शिक्षण संस्थानों में एक ऐसा मुक्त और समावेशी वातावरण तैयार करना है जहाँ हर छात्र समान महसूस करे।
अदालत ने इन नियमों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों को भारत की अखंडता और एकता का केंद्र होना चाहिए। जस्टिस बागची ने इस दौरान अमेरिका के ऐतिहासिक नस्लीय भेदभाव का उल्लेख करते हुए चेतावनी दी कि हमें भारत में ऐसी स्थिति से बचना होगा जहाँ कभी श्वेत और अश्वेत बच्चों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मौजूदा सुरक्षात्मक ढांचे (3E) पहले से ही प्रभावी हैं, तो नए प्रावधानों (2C) की प्रासंगिकता क्या है? कोर्ट ने साफ किया कि वह इन नियमों की जांच केवल इस आधार पर कर रहा है कि क्या ये संवैधानिक रूप से वैध हैं या नहीं।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन ने UGC अधिनियम की धारा 3(C) को चुनौती देते हुए इसे ‘भेदभावपूर्ण’ बताया। उन्होंने तर्क दिया कि ये नियम केवल इस धारणा पर आधारित हैं कि सामान्य श्रेणी के छात्र ही भेदभाव करते हैं, जो संवैधानिक समानता के विरुद्ध है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को राजनीतिक रंग देने के बजाय विशुद्ध रूप से छात्रों के संरक्षण और सामाजिक न्याय के चश्मे से देखने का निर्देश दिया है। अब सभी की नजरें 19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ सरकार और UGC को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी ।

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